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MetalHead - Poet - -Vocalist -ScriptWriter - Event Manager- Soft Skill Coach - Thinker - Amateur Photographer

Sunday, August 19, 2012

इकतारा

It's the price you pay of being an artist. Unlike others, it is tough for you to keep, all you feel, inside - within you. With all the riots, in the name of land, religion etc, is happening - I just felt over-whelmed. and penned down whatever came to my mind.


कुछ अनकही सी,
इक खामोश नदी सी,
रूठी ज़मीं सी
चले जा रही है ज़िन्दगी

कौन है कहाँ?
कब तक वहां?
जाएगा फिर कहाँ ?
यही सोच रहा है

क्यूँ बुझ जाती है रात को
बाती गुलाल की
और झलक - सी दिखला जाती है
वो परछाईयाँ - अंधेरो में भी
कब तलक डरेगा तू?
ओ सवेरा, अब आ भी जा

बंद हो गए कपट,
धरती भी नीलाम हुई,
और तूफानों में भी,
सन्नाटे-सी शाम हुई

राम-अल्लाह- येशु मसीह
सबकी सूरत - निष्प्राण हुई
और यूँही सबके घर में
अनजानों की सभा सम्मान हुई

आते आते, लव्ज भी ठहर जाते
जब ज़ुबान पे,
और किसकिसाती सी झालर
जगमगाती दीवार पे
तब कहीं आँगन से आती
मुस्कराहट अपमान की

यूँ तो सब ही, साथ रहते
हैं यहीं वसुंधरा
पर साथ रखते कुल्हारियां
तलवारों की टोलियाँ
बंदूकें भी है कई
धर्म की - बे-ईमान की
राजदूत हैं कई -
और राजनीति हैं नयी
धर्म की परिभाषा ये
अंड के आकार की
कह दिया उसने जो काफिर,
बात उसकी मान ली

मैं मिला जिससे भी अब तक,
सब कहें हैं इक ही बात
क्यूँ लड़ते फिरे हैं सब यूँ,
हैं जो इसमें किसका हाथ
हम तो चाहे दो ही रोटी,
और थोड़ी बोटियाँ
मिल जाए जो मुफत में,
ओहदे से
हो चाहें कटपुतलियाँ

पैदा करो उतनी ही सांसें
जितनी की तुम संभाल सको
ना कि इतनी किलकारियां
जो समय को हार दो

आज सब है यूँ डरे,
भयभीत सबके हैं दो मन
कि काश अल्लाह या फिर राम
अपने में हो संग्लन

किस चौराहे पर खड़े बेवक़ूफ़ ने था कहा
भगवन ने जन्मा है, बरसो पहले, ये जहां
मसखरे तू देख ले, कि तू कहाँ से आगया
जन्म देने वाली, हंसती माँ को तू ही मार गया