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Monday, July 23, 2012

गुफ्तगू (फज्र)

आज की ये शाम,
कुछ खफा-खफा सी लगती है मुझे,
जाने क्यूँ, अनजानी, अनसुनी सी लगती है,
क्यूँ, वो पत्थरों से होने वाली मधिम गुफ्तगू
आज चुपचाप-सी है,

इक सन्नाटा सा है,
जो फुसफुसाता है धीरे- धीरे,
कि "आँखें खोल ले , ए-दोस्त,
और सुन- उस दस्तक को जो खुद-बखुद इशारे से
तुझे बुला रही है"

इक ख़ामोशी का आलम सा छाया हुआ है
इस तरह, कि अपने साथियों के साथ भी
खुल के नहीं हँसता अब दिल,
कभी बीती हुई रातों को,
कभी भूली हुई यादों को,
कभी बिसरी हुई बातों को,
कभी बेजान-से उन वादों को,
गिन-गिन कर, काटता है दिन को,
थोड़ी तस्सल्ली भी देता है
कि "ओ इंसान, अब तू ज्यादा मजबूत है"

फिर - मैं यूँही इठलाता जब थोडा खुश होता,
तो ये सनकी दिल,
और रूखी रूह फिर बोलती,
"अरे, हम तो मज़ाक कर रहे थे"

शायद इन लतीफों कि दरिया में ही
गुम ना हो जाऊं,
पर ये तय है,
कि उस तन्हा बरगद की तरह,
मुस्कुराता रहूँगा

- अक्स



(Image courtesy- Google)

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