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Monday, September 10, 2012

फनकार

रूह की फरमाईश कुछ ऐसी तलब हो गयी

कि अब्र-आलूद सी रात भी चुंधिया गयी

मौसम-ए-इश्क की नुमाईश चुनिन्दा सी यूँ हो गयी

कि डर गया एक पल को ये क़ल्ब


इक सूनी-सड़क के बाज़ू में

वो अँधा भिकारी कुछ शक्लें बना रहा था

सफ़ेद चूने के पत्थर से,

एक तरफ से वो थोडा थोडा उस मंदिर की मूरत सा लगा

वहीँ दूसरी ओर - इंसान और जानवर का मिला जुला नजराना था


मैं कुछ समझ न पाया,

कुछ आते जाते राहगीरों ने जेब से

बिना देखे, सिक्के दाल दिए

शायद तरस खा रहे थे उसपे

वहीँ थोड़ी ही दूर एक ठेले से

इक बच्ची चूड़ी खरीद रही थी

और ये जनाब उस खन-खन को अपनी

जज्बा बनाये रखे थे


अँधा था वो

थोडा अनजान था वो इन चेहरों से

अन्दर के चेहरे को पढता था वो

बंद-बंद पत्थरनुमा आँखों से

पढ़ लेता था उनकी रूह की असलियत को

फिर भी मुस्कुरा कर उठा लेता उन् सिक्कों को

शायद उनकी इस ख्याली भीख को तस्लीम कर

उन्हें अपनी मुस्कराहट बेच रहा था

अनजान, अजनबी,अकेला


ऐसा फनकार था वो



Akshat "The Reflection" Sharma

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