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Wednesday, September 26, 2012

Kafia


एक और गुमराह सी रात थी वो 
खामोश और खिलाफ-इ-मामूल 
ऐसा ही एक दिन भी था, साकी,
आज किया जो कबूल

कुछ इशारे भी मिले थे -
फज्र की खुदमुख्तार रौशनी में 
फिर क्यूँ न समझ पाया मैं
तेरी बातें ओ रसूल

उस मैदानी मोहब्बत में
खुश्क से वादें किये गए वो 
और अब याद भी न  रहे उन्हें
इस तालुक्कात के उसूल

याद, बेगरज से आये थे वो  
सुबह की चांदनी में, बिखरे बिखरे
खो हुए जो दिखे, अपनी आँखों में
जज़्ब कर गए
हम भी गौर ना कर पाए अपनी ग़ज़ल-इ-इश्क पर
और यूँ ही खो बैठे सारी शायरी

शायद कभी इजाजात मिलेगी
तो उन्हें भी तोहफा देंगे
अपने लफ़्ज़ों से,
पिरोये हुए मोतियों का,
पर डरते हैं कहीं वो ये कह न दे
कि "कतार में लगे रहो, 
अगर फुर्सत मिली इन जवाहरातों से
तो शायद इस बेजान मोती को भी छुएंगे"

अपने अक्स को ही जब
मुस्तरद कर दिया तब  
क्यूँ ज़ाहिर करना जरूरी है उनके लिए
हक कि आबो-हवा

आप वो मुखालिफ नहीं जिससे 
वसोख्त की ज़हानत तोहफे में मिली हो
न ही हम वो शायर जो अपनी रदीफ़ भूल जाएँ  
गौर करें हर पैमाने पर,
हर टुकड़े की इनायत पर, 
तखल्लुस है यही छिपा जो
दरख़्त की ज़ुल्फ़ ओड़े चिल्ला रहा 
कि

वो हंसी मोहब्बत की, एक बार लबों पे आजाये
तो अबशार भी मोड़ देंगे हम 

बस एक बार दस्तखत कर दो, हमारे इस सबक पे
तो ये अफसार भी छोड़ देंगे 

-    Akshat “The Reflection” Sharma 

खिलाफ-इ-मामूल-against the practice
 खुदमुख्तार-Arbitrary 
रसूल-Prophet
 तालुक्कात -relation
 बेगरज-Selfless 
मुस्तरद - reject
कतार -queue
 मुखालिफ - Rival
वसोख्त की ज़हानत -Inborn talent towards hatred and disgust
( रदीफ़- Rhyming of the last word 
तखल्लुस- Poetry 
दरख़्त - Tree 
 अबशार - Waterfall  
अफसार - Tribe. 


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